सतीश मित्तल- विचार

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अल्पसंख्यक कौन?

Posted On: 21 Aug, 2016 में

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“सामाजिक नियम फिजिक्स अथवा मैथ्स की तरह स्थायी नहीं होते। इसके मूल्यों व् नियमों में समय, स्थान आदि के अनुसार निरंतर परिवर्तन होता रहता है। समयानुकूल उचित परिवर्तन ही समाज को जीवंत बनाता है।”
देश का बंटवारा हिन्दू-मुसलमान के आधार पर हुआ। नेताओं ने आज सत्ता में बने रहने के लिए 127 करोड़ भारतीयों की टीम इंडिया के वोटों के आधार पर बंटवारा कर उसे दलित,जाट,ब्राह्मण, अल्पसंख्यक आदि में बदल दिया।
खैर आज की पोस्ट में अल्पसंख्यक कौन है ? पर विचार करते है। जिसका चुनावी डुगडुगी बजते ही चुनावी मैदान में शोर मचने लगता है।
मन में ढेरों प्रश्न है। देश में अल्पसंख्यक घोषित करने के क्या मापदण्ड है? इसकी क्या परिभाषा है? सीमापार से आया बहुसंख्यक क्या भारत में अल्पसंख्यक कहलायेगा ? बहुसंख्यक का अल्पसंख्यक बन जाने पर क्या उसे अल्पसंख्यक माना जाएगा ?
लोकतंत्र में चुनावी मजबूरी के कारण अल्पसंख्यक शब्द आज एक धर्म विशेष का पर्यायवाची शब्द बन कर रह गया है ? मीडिया में अन्य अल्पसंख्यक को प्रतिनिधित्व नहीं दिया जाता ! क्या मीडिया TRP के चक्कर में पक्षपात करता है ? अल्पसंख्यकों के मुद्दे पर केवल एक अल्पसंख्यक वर्ग ही सभी अल्पसंख्यकों का प्रतिनिधित्व करता नजर आता है। चाहे वह अहिष्णुता का मुद्दा हो , सेकुलरिज्म का, या कोई और मुद्दा ।
हजारों वर्ष पुरानी भारतीय संस्कृति में शायद ही अल्पसंख्यक का कहीं प्रयोग हुआ हो। वर्ष 1977 की क्रांति ने केंद्र में एक पार्टी का एकाधिकार खत्म कर दिया। तब से अल्पसंख्यक को लेकर चुनाव जीतने के लिए जोरदार बयानबाजी व् बहस होनी शरू हो जाती है। समान अधिकार प्राप्त भारत के सभी नागरिकों पर जान न देकर कुछ नेता तो सत्ता सुख की खातिर इस शब्द को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करते है। वैसे सभी जानते है हाथी के दांत खाने के कुछ और होते है और दिखने के कुछ और! अल्पसंख्यक को लेकर नेताओं की बयानबाजी को देखकर यह कहावत सही प्रतीत होती है कि केतली चाय से ज्यादा गर्म होती है।
अल्प + संख्यक दो शब्दों से मिलकर “अल्पंख्यक” बना है। अल्प का अर्थ कम व् संख्यक से आशय संख्या से है। अर्थात जिसकी संख्या कम हो वो अल्पसंख्यक । परन्तु जनसख्या अनुपात कितना कम हो, इसकी कोई परिभाषा नहीं है। अर्थात जनसख्या अनुपात कुल जनसख्या का 8%, 25% 42% या 60%, 70% या कितना ? इसकी कोई परिभाषा नहीं है।
अंतरराष्ट्रीय नियमों, परम्पराओं, मान्यताओं के अनुसार किसी धार्मिक समूह को अल्पसंख्यक घोषित करते समय निम्न मापदंड होने चाहिए-
” अल्पसंख्यक धर्म के अनुयाइयों की जनसख्या-अनुपात कुल जनसख्या का 8 % से कम होना चाहिए अर्थात 8% या उससे अधिक की जनसख्या अनुपात वाले धार्मिक समूह को अल्पसंख्यक “केटेगिरी” में नहीं रखा सकता।”
देश में इस समय 6 धर्मों के अनुयाइयों जिनमें मुस्लिम, ईसाई, बौध्ध, सिख, जैन व् पारसी है को अल्पसंख्यक की श्रेणी में रखा गया है । यद्यपि यहूदी धर्म के अनुयाइयों का जिनका जनसख्या अनुपात भारत की कुल जनसख्या का काफी कम है ,को अल्पसंख्यक नहीं माना जाता। शायद उनका चुनावी वोट कम है इसी लिए उनको उपरोक्त ग्रुप में नहीं रखा गया।
आज जिस प्रकार से रोजगार, शिक्षा व् विशेषकर कुछ राज्यों में सुरक्षा कारणों से लोगों का लगातार पलायन हो रहा है, इससे देश कई राज्यों , जिलों , कस्बों आदि में बहुसंख्यक की जनसख्या अनुपात में बड़ा बदलाव आ गया है व् उनकों वहां पर अल्पसंख्यक कहा जा सकता है। देश के कुछ क्षेत्रों में बहुसंख्यक का जनसख्या अनुपात घटकर अल्पसंख्यक के मुकाबले कम या बराबर हो गया है। इस तरह से स्थानीय स्तर पर अल्पसंख्यक- बहुसंख्यक समस्या पैदा हो रहीं है।
लोगों को समझ में नहीं आ रहा किसे अल्पसंख्यक कहा जाए और किसे बहुसंख्यक। उदाहरण के लिए पश्चिमी बंगाल का कालियाचक जिसमें वर्ष 2016 की घटना ने पुरे देश को हिला कर रख दिया था,जहाँ पर बहुसंख्यक की परिभाषा ही फेल हो गई है।
उत्तर प्रदेश के 75 जिलों में 20-25 से अधिक जिलों में जनसख्या अनुपात में दोनों वर्गों में ज्यादा अंतर नही है। शामली जिले (जो पहले मुजफ्फरनगर जिले का हिस्सा था) का “कान्धला” पलायन के कारण जनसख्या अनुपात का असन्तुलन एक ज्वलंत उदाहरण है। जहां पलायन के कारण बहुसंख्यक जनसख्या अनुपात का प्रतिशत 10% से भी कम है। बिहार में भी कुछ स्थान इसी श्रेणी में रखे जा सकते है।
कश्मीर घाटी में अल्पसंख्यक व् बहुसंख्यक अनुपात देख आप ज़रा सोचिये कौन बहुसंख्यक है। अतः स्पष्ट है जनसख्या अनुपात में सुरक्षा व् अन्य कारणों से पलायन के कारण अल्पसंख्यक व् बहुसंख्यक का बंटवारा स्थाई रूप से सदा-सदा के लिए नहीं किया जा सकता। यह एक निरंतर चलने वाली प्रकिर्या है
यदि नेता वास्तव में समान अधिकार प्राप्त सभी भारतीयों का विकास करना चाहते है तो अल्पसंख्यक व् बहुसंख्यक के नाम पर फूट डालने से बाज आये। यदि चुनावी मजबूरी के कारण ऐसा करना जरूरी लगे तो फिर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के आंकड़े राष्ट्रीय जनसख्या स्तर के साथ-साथ राज्य, जिला, तहसील आदि के आधार पर एकत्रित किये जाने चाहिए। और उसी जनसंख्या अनुपात के आधार पर अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक की श्रेणी बननी चाहिए ताकि सभी भागों के अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक विकास हो। सभी भारतीयों की शिक्षा, चिकित्सा , रोजगार , सुरक्षा की गारंटी हो। सुरक्षा के अभाव में किसी भी राज्य , जिले या तहसील स्तर के सख्या अनुपात में अंतर होने पर क्षेत्रीय अल्पसंख्यक का कैराना आदि की तरह पलायन न हो । एक समान विकास हो।
आइये मिलकर विचार करें । अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक के नाम पर डिवाइड एंड रूल करने वाले नेताओं का भंडा फोड़ करे । विकास की राजनीती करने वाले नेताओं को आगे लाएं। तभी सच्चे अर्थों में 127 करोड़ लोगों की टीम इंडिया की सही मायनों में जीत होगी । देश बढ़ेगा तो हम बढेंगे ।
अकेला चना कभी भाड़ नहीं फोड़ता ! सबका साथ , सबका विकास जरूरी है।
जय हिन्द , जय भारत !

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2 प्रतिक्रिया

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Capt.Kristen Marie के द्वारा
25/08/2016

(capt.kristen@hotmail.com) Hi Dear, My name is Capt.Kristen Marie Griest, From Orange, Connecticut, United States, I am US Army Special force at Ein al-Asad Us military base Syria, I pick interest on you. I will like to establish mutual friendship with you. I will introduce myself better and send you my pictures as soon as i receive your mail.(capt.kristen@hotmail.com) Regards, Capt.Kristen M Griest,

Shobha के द्वारा
22/08/2016

श्री सतीश जी बहुत अच्छा विस्तार से लिखा लेख |सोचने को विवश करता है


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