सतीश मित्तल- विचार

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परीक्षा में नक़ल

Posted On: 20 Mar, 2015 Others में

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नकल करना,उतारना जीवो का एक कुदरती गुण है। यह लगभग धरती के सभी जीवों में पाया जाता है। पशु-पक्षी जैसे बन्दर, तोता आदि। मनुषय बचपन से ही नक़ल के माहिर खिलाड़ी होते है। बच्चे नकल करते हुए ही सीखते है। बचपन में घर, रिश्तेदार, पड़ौसी की नकल करते है, स्कूल कॉलेज में टीचर्स की। समाज बच्चो की इस नकल को बचपने की शरारत मान भूल जाता है । आप और हमने सभी ने बचपन में किसी न किसी की नकल की है। कुछ और नहीं तो शोले की बसंती , गब्बर या धर्म जी की जिसमें बसंती इन कुत्तों के सामने मत नाचना, कुत्तो में तुमहरा खून पी जाऊंगा आदि-आदि l आज बिहार से अखबारों, फेस-बुक आदि में तस्वीर छपी है जिसमें 10th की परीक्षा में छात्र व् उनके शुभचिंतक स्कूल की ऊँची बिल्डिंग में खिड़कियों के सहारे चढ़ कर जान पर खेल कर परीक्षा में नकल का खेल, खेल रहें है।
सचमुच ही दुर्लभ दृश्य है। जिससे सिद्ध होता है कि जहाँ चाह वहां राह हो तो आदमी कुछ भी कर सकता है। इससे यह भी सिद्ध होता है, आज नकल का जमाना है। सरकार नया नोट जारी करती है,उसकी नकल पहले हो जाती है। चीजों, वस्तु की नकल आम बात है। स्कूल कॉलेज की परीक्षा में नकल , नौकरी की परीक्षा में नकल। कहते है नक़ल में भी अकल चाहिए। बिहार में परीक्षा में जिस तरह से खतरों के खिलाड़ियों दवरा नक़ल करवाई जा रही है सचमुच इसमें नितीश जी के सुशासन की तश्वीर नजर आती है कि किस प्रकार लोग नीडर होकर सफाई से नकल के कारोबार को अंजाम दे रहे है। कुछ लोग हर रोग में दवा के रूप में प्रयोग होने वाली पेंसलीन ( एन्टीबॉयोटिक दवा ) का प्रयोग करते हुए इसमें भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ एक पार्टी विशेष या आदमी विशेष का नाम ले सकते है कि हो न हो विदेशी हाथ की तरह नक़ल में भी उनका हाथ हो l जो सरकार के सुशासन को सहन नहीं कर पा रहें है। आज के तकनीकी हाई- टेक युग में जहाँ लोग नकल के नए-नए तरीके अपनाते है , वहीं बिहार में नक़ल के इस परम्परागत तरीके की दाद देनी होगी, जो सदियों बाद में अपने उसी रूप में मौजूद है l
नक़ल में छात्रों को दोष देनी उचित नहीं है। दोष है तो हमारी शिक्षा प्रणाली का। जिसका पाठयक्रम व् परीक्षा-पत्र नकल को बढ़ावा देने वाला होता है। जिसमें नकल से काम चल जाता है, अकल लगाने की आवश्यकता ही नहीं।

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