सतीश मित्तल- विचार

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गधा और चौकीदार ?

Posted On: 5 May, 2015 Others में

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कुम्हार राज्य में काम-काज चलाने के लिए स्थायी व् अस्थायी नौकरशही में एक अदद गधा व् कुत्ता भी शामिल था l नौकरशाही के अलग-अलग कार्य, सीमाएं व् अधिकार क्षेत्र निर्धारित थे। जैसे शरीर से भारी व् बुद्धि से कम गधे को भारी सामान ढोने का दायित्व सौंपा गया l चतुर कुत्ते को चौकीदारी का काम। गधे ने अपने काम, चाल-चलन से कुम्हार का मन मोह लिया। कुम्हार गधे के सीधेपन पर फ़िदा हो गया। वह कुत्ते की बजाय गधे पर ज्यादा ध्यान देता। कुम्हार के अत्यधिक सम्मान से गधे के मन में घमंड हो गया। उसने अपने अधिकार सीमा का उलघ्घन करना शुरू कर दिया। जब-तब गधा, कुत्ते की अधिकार सीमा में प्रवेश कर जाता। गधे का मन अपने भारी काम में कम व् कुत्ते के चौकीदारी के काम में ज्यादा लगने लगा। गधे ने कुम्हार की नजरों में बने रहने के लिए , कुत्ते के चौकीदारी के काम में दखल शुरू कर दिया। आये दिन कुत्ते व् गधे के बीच अधिकारों को लेकर टकराव व् तकरार होने लगी। कुत्ते ने गधे को समझाया कि तेरा काम भारी काम करना है, चौकीदारी नहीं। पर गधे के कान पर जूं तक न रेंगी। गधा रात भर जाग-जाग कर रखवाली करते हुए ,बिना किसी कारण के रात भर ढेचूँ-ढेचूँ करता। ढेचूँ-ढेचूँ की आवाज सुन कुम्हार रात भर जाग ,गधे को बीमार जान, पुचकारता,सहलाता। कुम्हार सोच में पड़, कारण ढूंढ़ता कि आखिर गधा बिना बात रात भर ढेचूँ-ढेचूँ क्यों चिल्लाता है ? ना ही गधा बीमार है। घास भी खूब खाता है। जाग कर रात में पहरा देने का प्रभाव गधे के कार्य पर पड़ने लगा। रात में गधे की ढेंचूं ढेंचूं सुन कुम्हार की नींद खराब होने लगी। आये दिन की वक्त बेवक्त की ढेचूँ-ढेचूँ सुन कुम्हार बैचेन हो जाता। गधे की उल्टी-सीधी हरकतों से कुम्हार का मानसिक संतुलन बिगड़ गया। उसे गधे पर क्रोध आ जाता। बोलता- गधा ! काम का ना काज , दुश्मन अनाज का।
आये आये दिन ढेचूँ-ढेंचूं से परेशान हो एक रात कुम्हार ने अपना आपा खो दिया l आव देखा न ताव गधे को लाठी से पीटने लगा । सुसरे! तूने नाक में दम कर दिया ! आज मै तेरी खबर लेता हूँ। अप्रत्याशित मार से गधा सहम गया। उसने ढेंचू-ढेंचू करना बंद कर दिया l गधा शांत हो जमीन पर स्वासन में लेट गया। कुत्ता बड़े ही शांत स्वभाव से यह नजारा देखता रहा। गधे को कुम्हार की जबरदस्त मार का कारण समझ नहीं आ रहा था। आखिर उसका क्या दोष था? उसने कुत्ते से विन्रम भाव से पूछा- “आखिर मेरा दोष क्या था? कुत्ते ने समझाया दोस्त ! तुमने दी गयी जिम्मेदारी व् अधिकारों से बाहर जाकर(Ultra Vires ) काम किया था । जिसका यह दुष्परिणाम हुआ। तुम्हारी अधिकारों से बाहर काम करने की प्रवृत्ति ने ही तुम्हे विपत्ति में डाला है। मतलब ? जिसका काम उसी को साजे और करे तो जूता बाजे ! एक राज्य की अस्थायी नौकरशाही कुछ इसी तरह का व्यवहार करती नजर आ रही है वो विकास के कार्यों पर कम अधिकारों से अधिकारों बाहर काम करने में ज्यादा रूचि ले रही है। MLA फंड के अभाव में एक स्ट्रीट लाइट तक लगा पाने में असमर्थ है। नाली सड़क की मरम्मत तो शायद दूर की कौड़ी है। “पहले इस्तेमाल करो, फिर विश्वास करो” स्कीम के तहत आज ही आप अपने क्षेत्र के MLA से एक अदद स्ट्रीट लाइट की डिमांड कीजिए। मैंने तो डिमांड की है क्या आपने की ? यदि नहीं तो जल्दी कीजिए। नतीजा सामने आ जाएगा हाथ कंगन को आरसी क्या ?

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Idalee के द्वारा
12/07/2016

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