सतीश मित्तल- विचार

ॐ सर्वे भवन्तु सुखिनः सर्वे सन्तु निरामयाः

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चस्केबाज

Posted On: 18 May, 2015 Others में

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दिल्ली सरकार व् माननीय उपराज्यपाल के बीच अधिकारों को लेकर छिड़ी जंग को देख कुछ शब्द अनायास ही मस्तिष्क में तैर जाते है जैसे नौटंकीबाज, ध्यान आकर्षक कर्ता , ध्यान साधक, चस्केबाज (Attention Seeker), मीडिया लती, चस्की आदि आदि । जब कोई व्यक्ति लोगों का ध्यान बार-बारकेवल अपनी ओर खीचने के लिए बात का बतंगड़ बनाता रहता है तो शोले के नौटंकीबाज वीरू (धर्मेन्द्र ) की याद अचानक से हो आती है। आइये दिल्ली के घटना क्रम से मिलती-जुलती गावं में प्रसिद्ध एक कहानी को इस संदर्भ में देखें।
एक भले आदमी को लोगों का ध्यान अपनी ओर खीचने अर्थात आकर्षित करने का एक अजीब सा चस्का था । ध्यान ध्यानाकर्षण करने के लिए वह हर रोज नहीं नयी नयी हरकत करता। वह अपनी हरकतों को तब तक दोहराता ,जब तक लोग उसको नोटिस न कर ले। ध्यानकर्षण से उसे मन ही मन बड़ा आत्मसुख की प्राप्ति होती। गावं के लोग भले आदमी की आये दिन की ध्यान आकर्षित करवाने वाली नौटंकी देख बोर होने लगे। अर्थशास्त्र के उपयोगिता ह्रास नियम की तरह नौटंकी की उपयोगिता तेजी से घटने लगी। एक दिन लोगों ने भले आदमी को नोटिश करना बंद कर दिया। भला आदमी इस बेरुखी से परेशान हो उठा। लोगों दवरा नोटिस न लेने से उसे लगने लगा जैसे उसे किसी ने दूध की मक्खी की तरह से निकाल दिया हो।
उसने काम काज छोड़ दिया। गावं की मर्यादा तोड़ने लगा। बड़े बूढ़ों से लड़ना झगड़ना शुरू कर दिया। महिलाओं, बुजुर्गों पर अमर्यादित टिप्पणी करने लगा। लोगों के घरों के ताले -कुंडे लगाने लगा। यह सब वह इस लिए करता ताकि लोग उसे फिर से नोटिस करें। कारण वो जानता था की या तो कुवां खुदवाने वाले का नाम होता है या कुवां बंद करवाने वाले का। बद या बदनाम दोनों दशा में नाम होता है।
भले आदमी की ऊल जलूल हरकतों से तंग आ , गावं वाले दवरा सर्वसम्मति से लिए गए निर्णय लिया गया कि कोई भी भले आदमी को न तो नोटिस करेगा और न उसकी बात का कोई उत्तर देगा। इस तरह से गावं के लोग धीरे धीरे शांति से अच्छे दिन गुजारने लगे।
परन्तु भले आदमी को ध्यानाकर्षण करवाने का चस्का बुरी तरह लग चुका था। लोगों का उस ध्यान न दिए जाने के कारण वह बैचेन हो उठा। रोज ऐसी युक्ति सोचने लगा जिससे लोग उस पर अधिक से अधिक ध्यान दें। पर नतीजा सिफर अर्थात वही ढाक के तीन पात रहा।
परेशान हो भला आदमी गुरू जी के पास गया। गुरूघंटाल की सलाहनुसार भला आदमी सोने की अंगूठी पहन गावं गया। परन्तु गावं वालों ने फिर भी उसे नोटिस नहीं किया। परेशान हो भले आदमी ने अपनी झौंपड़ी में आग लगा दी। पूरा गावं झोपड़ी की आग को बुझाने लगा। आग बुझाने वालों में से कोई भी भले आदमी की सोने की अगूंठी को नोटिस नही कर रहा था। वह बार-बार अंगूठी दिखाने हुए अंगुली से इशारा करता। अरे !यहाँ पानी डालो। अरे ! वहां पानी डालो। आग बुझाते-बुझाते शाम हो गयी ,परन्तु किसी ने भले आदमी की अंगूठी को नोटिस नहीं किया। झौपंडी पूरी तरह जल जाने के बाद एक आदमी की नजर भले आदमी की सोने की अगूंठी पर पडी। बोला – अरे ! सोने की अंगूठी कब पहनी ? भले आदमी ने माथा पीट लिया। बोला – भाई ! सुबह से सोने की अंगूठी पर ध्यान आकर्षित करवाना चाह रहा था परन्तु किसी ने भी मेरी सोने की नयी अंगूठी पर ध्यान न दिया। आपका ध्यान अंगूठी पर दिलाने के लिए ही लिए मुझे झोपड़ी में आग लगानी पडी । अब इस ध्यान का क्या फायदा जब सब कुछ जल कर खाक हो गया। सच ही कहते है विनाश काले विपरीत बुद्धि।
दिल्ली की सरकार से नरम निवेदन है कि वह अधिकारों के दंगल में जनता का नुकसान न करे। चाकू खरबूजे पर गिरे या खरबूजा चाकू पर दोनों दशाओं में नुक्सान खरबूजे का ही होता है। सरकार को अपनी शक्ति फालतू कामों को छोड़ जनमत की आकांशा पूरी करने में लगानी चाहिए। भला दो झोटों (भैंसे ) की लड़ाई में झुंडों का नुक्सान क्यों हो ?

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8 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Destrie के द्वारा
12/07/2016

Aaron:If people are going for higher education to learn something new, and to exercise some critical thinking, th„¢‚¢âìâats good investment for the future.Yes, but if people can think for themselves, then the choice of what sort of education to have ought to lie with them.And that’s all I’m saying.

Shobha के द्वारा
19/05/2015

श्री सतीश जी यदि प्रजातंत्र मैं विपक्ष को जनता नकार देगी फिर यही होगा शोभा

    Karik के द्वारा
    12/07/2016

    Stay with this guys, you’re helinpg a lot of people.


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