सतीश मित्तल- विचार

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दिल्ली में अति का दुष्प्रभाव

Posted On: 25 Jul, 2015 Others में

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अति से आशय अधिकता से है। किसी भी चीज की अधिकता बुरी भी हो सकती है। अर्थशास्त्र में उपयोगिता ह्रास नियम अधिकता पर आधारित है। कबीरदास का दोहा है :-
अति का भला न बोलना ,
अति का भली न चूप।
अति का भला न बरसना ,
अति की भली न धूप ।
1975 की इमरजेंसी के विरोधस्वरूप जनता पार्टी को बहुमत मिला । अति के जोश में सरकार जनता की उम्मीदों पर खरी न उतरी और लगभग ढाई साल में चलती बनी।
अति घमंड पैदा कर सकती है। मानसिक संतुलन बिगाड़ सकती है । तन, मन को हानि पहुंचा सकती है। गंगा के अति वेग से प्रवाहित जल प्रलय से धरती को बचाने के लिए भगीरथ को भी शिव की जटाओं की आवश्यकता पडी थी । अति में विन्रमता जरूरी है। झुकना एक विशेष गुण है। तेज हवा आंधी तूफ़ान में यही गुण पेड़ों की रक्षा करता है।
दिल्ली राज्य सरकार को विधान सभा में जनता की उम्मीदों के कारण प्रचंड बहुमत मिला । पर बहुमत की अति के कारण ऐसा प्रतीत होता है जैसे सरकार विकास कार्यों पर ध्यान कम केंद्रित कर रही है और विवादित मुद्दों पर अधिक । सरकार जनता की समस्याओं में कम रूची ले रहे है, केंद्र के मुद्दी में ज्यादा ।
ऐसा नहीं है सरकार ने कल्याण के कार्य न किये हो उनमें मेरी नजर में कुछ प्रमुख निम्न है-
1–बिजली की 400 यूनिट तक रेट कर कम अपना वादा निभाया ।
परन्तु बिजली के मीटर का तेज चलना, बिजली कम्पनी का लोड बढ़ाकर कर, लोड व सिक्योरिटी के रूप में उपभोगता से अधिक पैसा वसूलना, बिजली की निरंतर सप्लाई की समस्या आदि पर दिल्ली सरकार की अधिक जिम्मेदारी बनती है । दिल्ली बिजली वितरण कम्पनियों में दिल्ली सरकार की 49% हिस्सेदारी है व कम्पनी बोर्ड में दिल्ली सरकार के डायरेकटर (Directors) है । अतः समस्या के लिए निश्चित ही दिल्ली सरकार भी जिम्मेदार है।

2–पानी के बिल माफ़ करना भी एक जन कल्याण का कार्य है । परन्तु पानी की पूर्ती एक समस्या है। इस पर भी सरकार को ध्यान देना चाहिए।

बहुमत की अति में दिल्ली सरकार टकराव का रास्ता अपना संविधान दवरा प्रदत्त अधिकारों से बाहर जाकर निर्णय लेती दिखाई दे रही है। नगर निगम को फंड का विवाद , उपराज्यपाल की अनुमति के बगैर महिला आयोग की अध्यक्ष की नियुक्ति , दिल्ली पुलिश को लेकर टकराव आदि इसके कुछ उदाहरण है।
जैसा की सब जानते है कि केंद्र के आधीन दिल्ली पुलिस का वार्षिक बजट 5500 करोड़ से अधिक है। जिसका भार केंद्र उठाता है । DTC, दिल्ली जल बोर्ड , बिजली कंपनी जो दिल्ली सरकार के आधीन है ,की हानि का भार दिल्ली की जनता को उठाना पड रहा है। यदि दिल्ली पुलिस का भार दिल्ली सरकार उठाने लगे तो इस खर्च के भार से दिल्ली का विकास ठप होगा , दिल्ली के लोगों पर कर का अतिरिक्त दिल्ली सरकार डालेगी जैसे कि पैट्रोल पर वैट बढ़ाकर, मनोरंजन कर या अन्य करों को बढाकर डाला गया है।
दिल्ली में आजकल तरह तरह हास्यपद अतिवादी जुमले हवा में तैर रहें है- जैसे
-नगर निगम हमें दे दो ( बिना चुनाव कराये )। हम प्रॉफिट में चला कर दिखा देगें ।
-गृह मंत्रालय हमें दे दो हम चला कर दिखा देगें ।
-दिल्ली पुलिस हमें दे दो, हम ठीक कर देगें।
-दिल्ली में इमरजेंसी जैसे हालात पैदा हो गए है ( फर्जी डिगी मामले में मंत्री के गिरफ्तार होने पर )
- पानी , सफाई , बिजली ,पेंशन आदि हम जिम्मेदार नहीं सिर्फ मोदी जिम्मेदार है।
अर्थात वो परेशान करते रहे हम काम करते करे । यह कैसे काम है जिसमे जिम्मेदारी किसी और की है । कैसा कुतर्क है जिसमें देश के PM राज्य सरकार या नगर निगम की विफलता के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है । इस तरह के जुमले मीडिया में सुन पब्लिक असहाय है ।
दिल्ली सरकार को “जो दिखता है, वो बिकता है” सोच से बाहर आना होगा । मार्केटिंग की दुनिया में तो यह चल सकता है, परन्तु शासन में रहते हुए काम को जमीन पर उतारना पड़ता है। साइनिंग इंडिया अतीत में इसका उदाहरण का है। सरकार में बैठे नेताओं से अपील है वह अति से बचे। लोकतंत्र चुनावों में बड़े से बड़े सूरमाओं को धुल चटनी पड जाती है।
केंद्र शासित प्रदेश दिल्ली में जनमत संग्रह जैसे तैरते मुद्दे कभी कभी देश के अंदर ही देश होने के खतरा सा लगता है । सरकार से अनुरोद्ध है कि वो ड्रामें के लाइट, कैमरा ,एक्शन से किनारा कर, हकीकत में एक्सन ले । विकास के लिए MLA फंड दे। अति के दुष्प्रभाव का केवल यही एकमात्र उपाय है।

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